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महर्षि पराशर जी
महर्षि Pareek Samaj

महर्षि पराशर जी

महर्षि पराशर जी का दिव्‍य जीवन जहां अत्‍यंत अलौकिक है वहीं अद्वितीय भी. उन्‍होंने धर्मशास्‍त्र, ज्‍योतिष, वास्‍तुकला, आयुर्वेद, नीतिशास्‍त्र, विषयक ज्ञान मानव मात्र को दिया. उनके द्वारा रचित ग्रन्‍थ वृहत्‍पराशर होराशास्‍त्र, लघुपराशरी, वृहत्‍पराशरीय धर्म संहिता, पराशर धर्म संहिता, पराशरोदितम, वास्‍तुशास्‍त्रम, पराशर संहिता(आयुर्वेद), पराशर महापुराण, पराशर नीतिशास्‍त्र, आदि मानव मात्र के लिए कल्‍याणार्थ रचित ग्रन्‍थ जग प्रसिद्ध हैं.

ऐसे, हमारे जाती के आद्य महर्षि पराशर जी, शक्ति मुनि के पुत्र एवं ब्रह्मर्षि वशिष्‍ठ जी के पौत्र थे. आपकी माता का नाम अदृश्‍यन्ति था जो उतथ्‍य मुनि की पुत्री थी. महर्षि पराशर जी का जन्‍म अपने पिता शक्ति की मृत्‍यू के बाद हुआ था, तथापि गर्भावस्‍था में ही इन्‍होंने पिता द्वारा कही हुई वेद ऋचायें कंठस्‍थ कर ली थी. महर्षि पराशर ने विद्याध्‍ययन अपने पितामह वशिष्‍ठ जी के पास रहकर अपने ही किया. तथा वे वशिष्‍ठ जी को ही अपना पिता समझते थे. किंतु एक बार पराशर जी की माता जी अदृश्‍यन्ती ने समस्‍त जानकारी उन्‍हें दी तथा अवगत कराया की उनके पिता शक्ति मुनि को राक्षसों ने, पराशरजी के जन्‍म से पूर्व ही मार डाला था.

अपने पिता की मृत्‍यू का, राक्षसोंद्वारा किया गया संहार का ज्ञान होने पर महर्षि पराशर को क्रोध आया तथा वे इस चिंतन में खो गये की उनके पिता एवं पितामह का देवतागण भी सर्वश्रेष्‍ठ तपस्‍वी एवं ज्ञानी होने से इतना सम्‍मान करते है, उन ज्ञानी तपस्वी का राक्षस भक्षण करे- यह सहन नहीं हो सकता. और इसी विषय में गहरा चिंतन कर महर्षि पराशर जी ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन इसी संकल्प से किया कि वे अपने पिता के वध का बदला लेकर, पृथ्‍वी मंडल से मानव और दानव दोनों ही कुलों को नष्‍ट कर देंगे. इसी समय ब्रह्मर्षि ने उन्हे समझाने कि चेष्टा भी कर कर देखी की धर्म की रक्षा करना ही ऋषि का धर्म होता है. इस परामर्श को सुन कर महर्षि पराशर ने मानव जाति को तो क्षमा कर दिया, किंतु राक्षसों के विनाश के लिए यज्ञ प्रारम्‍भ कर दिया.

पराशर जी पुलस्‍त्‍य मुनि का बड़ा आदर करते थे. ऐसे में यज्ञ द्वारा राक्षस कुलों का सर्वनाश होते देखकर पुलस्‍त्‍य मुनि जी ने पराशर से अनुनय-विनय की कि आप यह यज्ञ न करें. साथ ही, राक्षस संहार यज्ञ की समाप्ति के लिए ब्रह्मर्षि वशिष्‍ठ ने भी पराशर जी को समझाया. पराशर जी ने अपने पितामह वशिष्‍ठ जी एवं अन्‍य महर्षियों के वचनों का आदर कर यज्ञ का विचार त्‍याग दिया. इसी समय पुलस्‍त्‍य जी ने उन्‍हें आशीर्वाद के रूप में निम्‍न वरदान दिया

'पुराण संहिताकर्ता भवान्‍वत्‍स भविष्‍यति.

देवतापारमार्थ्‍य च यथावद्वेत्‍स्‍यते भवान्..

अर्थात हे वत्‍स पराशर, पुराणों को संहिताबद्ध कर समस्‍त शास्‍त्रों के गूढ़ तत्‍वों को आत्‍मसात कर समस्‍‍त शास्‍त्रों में पारंगत होवोगे. पश्चात महर्षि पराशर जी ने धर्मशास्‍त्र, ज्‍योतिष, वास्‍तुकला, आयुर्वेद, नीतिशास्‍त्र, विषयक ज्ञान मानव मात्र को दिया. उनके द्वारा रचित ग्रन्‍थ वृहत्‍पराशर होराशास्‍त्र, लघुपराशरी, वृहत्‍पराशरीय धर्म संहिता, पराशर धर्म संहिता, पराशरोदितम, वास्‍तुशास्‍त्रम, पराशर संहिता(आयुर्वेद), पराशर महापुराण, पराशर नीतिशास्‍त्र, आदि मानव मात्र के लिए कल्‍याणार्थ रचित ग्रन्‍थ जग प्रसिद्ध हैं.